सोमवार, 27 जुलाई 2009

पढ़ा गया सूचि में भी गलती हो सकती हैं ?कृपया लिखे

अभी 15 मिनट पहले ब्लागवाणी पर राष्ट्रपिता -राष्ट्रमाता ,फिर राष्ट्रपति -राष्ट्रपत्नी क्यों नही ? पोस्ट किया था 10 मिनट में ही 3 साथियों ने इसे पढा एवं नेट बंद करने के पहले ब्लागवानी को देखने पर पता चला कि-- पढा गया के स्थान पर 0 था , क्या तकनीति खराबी के करण ऐसा होता हैं ..या अन्य कारण से भी इस तरह की गलती हो सकती हैं ? कृपया विषय सम्बन्धीत सुधी पाठक मुझे बताने का कष्ट करे ।

राष्ट्रपिता-राष्ट्रमाता ,फ़िर राष्ट्रपति -राष्ट्रपत्नी क्यों नहीं--?

कुछ लोगों को राष्ट्रपत्नी ....शब्द कोष में ढुढने पर भी नहीं मिल रहा हैं अब शब्दों पर किसी का वश तो चलता नहीं कि हर शब्द ,कोष में ही मिल जाए ,यदि यह शब्द नई हो तो भारतवर्ष के परिवेश में इसे समझा जा सकता हैं ,देश में राष्ट्रपिता कहने से गर्व होता हैं ,राष्ट्रचाचा भी शान हैं ,यहॉं राष्ट्रमाता भी हुए हैं ,राष्ट्रपति तो जगजाहिर हैं, अब यदि राष्ट्रपत्नी हो गए तो हर्ज क्या हैं ,जिस तरह पत्नी , पति का जान देकर भी सेवा करती हैं ,बच्चों का देखभाल ही नहीं करती बल्कि एक अच्छी नागरिक बनाकर देश को तोफा के रूप में सौप देती हैं ,सति सावित्री ,अनुसुया,तिलोत्तमा ,सीता, अरूंधुती,आदी न जाने कितनी विदुषी पित्नयॉं अपनी शक्ति से देश और समाज को राह दिखाई हैं ,एक क्रांतिकारि साथी को पुछा गया कि तुम्हारा शादी हो गया हैं ? तो उत्तर मिला हॉं .....पुछा गया किसके साथ उत्तर ? उत्तर मिला - इस देश के साथ ,अब एक क्रांतिकारी यदि देश को पत्नी के रूप में स्वीकार कर सकता हैं, तो किसी को भी राष्ट्रपत्नी बनने पर गर्व होना चाहिए,अभी तो अगिनत रिस्ते बनने बचे हुए हैं ,शिक्षक -शिक्षिका,अध्यक्ष -अध्यक्षा ,पिता -माता इसी तरह राष्ट्रपिता -राष्ट्रमाता ,अब राष्ट्रपति और राष्ट्रपत्नी यह तो साधारण सी बात हैं ,हम सब रिस्तों के डोर से बन्धते चले तो देखिए फिर देश में सभी रिस्ते ही रिस्ते नजर आ आयेंगे ............. अब इसे किसी भी रूप कोई इस्तेमाल किया सकता हैं .....सुवरण को खोजत फिरे...कवि ,व्याभिचारी ,चोर ....मैं तो शब्द को कवि के रूप में देखना समझना ज्यादा पसन्द करता हूँ ।

शनिवार, 25 जुलाई 2009

भूतपूर्व राष्ट्रपति कलाम जी का चीरहरण कर एक विमान कंपनी ने अपमान किया -यदि यही हाल राष्ट्रपत्नी का हो तो !!

जब सामान्य जन पर अत्याचार होता है ,तो नेताओं को जश्न मनाने का सुनहरा अवसर प्राप्त होने के कारण जनता का सहानुभूती प्राप्त हो ,इस हेतु मुआवजा बॉंटे जाते हैं , एक करोड़ बॉंटने के लिए 3 करोड़ रूपये सरकारी खर्च हो जाता है ,अब राष्ट्रपति पर अत्याचार हुआ वह भी एक भु.पू राष्ट्रपति पर एक अमेरिकी विमान कंपनी ने श्री ए.पी.जे अब्दुल कलाम का चीर हरन करके वापस कर दिया ,हम हल्ला इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वे राष्ट्रपति थे ,अब प्रश्न यह उठता हैं कि राष्ट्रपति के साथ तो हमेशा अंग रक्षक हुआ करता हैं, यदि वे नहीं चाहते कि उनके चीर हरण हो तो क्या मजाल कि एक आदना सा विमान कंपनी राष्ट्रपति का अपमान कर सकें । भु पू हुआ तो क्या हुआ ...ए पी जे अब्दुल कलाम के लिए दूनियॉ के सभी हिस्तयॉं मान-सम्मान रखते हैं ,यदि चीर हरण पर एपीजे अब्दुल कलाम जी को अपमान नहीं हुआ तो हम किसके लिए अपमान पर चिल्हाते हैं ,विचारनीय प्रश्न हैं । यदि कलाम जी को अपमान का अहसास होता तो वे उस हवाई जहाज पर सफर ही न करते ....यदि बहुत आवश्यक होता तो अन्य विमान की व्यावस्था किया जा सकता था , पिछले कुल समय से विमान कंपनीयों ने चुन -चुन कर हमारे शिर्ष्य नेताओं और मंत्रीयों का चिर हरन करने में लगे हुए हैं ,भुपू रक्षामंत्री ,भुपू अर्थमत्री सभी का चिर हरण हुआ ,ये मंत्रीयों को जब नंगा करके जॉंच किया जाता हैं तो ये चुपचाप सब कुछ करने देते है जैसे धारा 377 में होता हैं, और जब देश में लौट आते हैं ,तो यहॉं आकर भी चुप चाप दुबके रहते हैं यदि कोई मिडीया ने मान अपमान की बात करने लगे तो कोई प्रतिक्रिता भी नहीं होता हैं ,अब फिर हम उन बेशर्म लोगों के लिए लड़ते रहे ,लिखते रहें ,हमे खा पीकर कोई काम नहीं हैं क्या ?एक राष्ट्रपति ने न्याय व्यावस्था पर बहुत चिल्हाये ,क्या न्याय व्यावस्था में सुधार हुआ हैं ? क्या देश सोने की चिडियॉं बन सका हैं ? राष्ट्रपति बनने पर हमें क्या मिल गया ? एक वैज्ञानिक के नाते देश को मिशाईल मिला ,देश को साहस मिला ,दुनियॉं में नाम हुआ ,परन्तु एक राष्ट्रपति याने रबर स्टाम्प बनके कलाम जी ने तो कुछ भी नहीं कर पाए । अनेक विद्वानों का तो मत हैं कि इसतरह की पद समाप्त कर देना चाहिए ,क्योंकि जनता का जितना धन राष्ट्रपति के शान ओ शौकत में खर्च हो जाता हैं वह इस देश के सेहत के लिए उचित नहीं हैं । एक राष्ट्रपति को सारी सुविधा देने के पश्चात भी यदि देश के शान को बरकरार न रख सके, तो मेरे मत में तो उन पर जनता के अदालत में खड़े करके न्याय सुनाना चाहिए ,स्वयं दोषी को कोई सहानुभूति दिखाने की आवश्यकता ही क्या हैं ? क्या देश ने उनके लिए कोई कमी किया है?उन्हें देने में कोई कंजूसी किया है ? यदि नही तो कलाम जी ! आपका अपमान मात्र अपना अपमान नहीं , यह देश के साथ आज भी जुड़ी हुई हैं ,अत: हमेशा इस बात को याद रखने पर ही आपका कल्याण हैं .........कल यदि हमारे राष्ट्रपत्नी पर इस तरह की घटना घटे तो !!!!!!!!!!

गुरुवार, 23 जुलाई 2009

शिक्षिका को नंगी करके रंग रगड़ा गया -न्याय न मिलने पर मांग रही हैं इच्छा मृत्यु -2

जशपुर नगर के केंदपानी स्थित जिस पाठशाला में सुनीता पढाती थी वहॉं जातिवाद आज भी चरम सीमा पर हैं,अत: छुआछुत मानने वाले यह नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों को एक नीच जाति के शिक्षिका पढाए , गॉंव के स्कुलों में मध्यान्ह भोजन की व्यावस्था सरकार द्वारा किया जाता हैं ,यदि सुनिता द्वारा बच्चों के भोजन को छु दिया जाता तो गॉंव के कुछ लोग उस भोजन को खाने नहीं देते थे छींटाकशी ,अपमान सभी सहन करते हुए सुनिता ने शिक्षण कार्य जारी रखा ,चूंकि सुनिता को गॉंव से भगाने की षडयंत्र कुछ लोगों ने रचा था, जिसके तरह दिनांक 11 मार्च 2009 ,पवीत्र होली के दिन बौखलाये हुए कुछ लोग सुनिता बंजुआ के घर में घुस कर उसे बाहर निकाले और उसे सेरेआम पिता और अबोध बालक समेत समस्त गॉंव वालों के समक्ष नंगे करते हुए सारे शरीर पर होली का रंग मलते हुए मौत का डर दिखाकर घंटों खड़ा करके ठहाकें लगाते रहे । इसके बाद जो कुछ हुआ इसकी जानकारी पूर्व लेख में दिया जा चुका है । चूंकि त्यौहारों के दिन शराब पीना आम बात हो गई हैं और गॉंव में तो सामान्य सी बात हैं, अत: होली के दिन सुनिता ने भी नशा की होगी ,इसी नशे का बहाना बना कर उन्ही लोगों ने एक शिक्षिका को सरेआम निर्वत्र कर मानव समाज को कलंकित कर दिया । इस मुद्दे को समाचार पत्रों द्वारा उठाया तो गया ,परन्तु प्रिंट मिडीया का कहीं नामोनिशाना नहीं मिलता । दिनांक 23 जुलाई 2009 को पुलिस ने गॉंव के कुछ लोगों को गि्रफ्तार किया ,परन्तु अब गॉंव के ही कुछ लोग शिक्षिका पर चरित्रहीन होने और शराबी होने का आरोप लगाते हुए कानूनी कार्यावाही को गलत साबित करने के लिए प्रशासन से मिलना शुरू किया हैं । बात शराबी होना ,चरित्रहीन होना आदी का नहीं हैं ,एक स्त्री को निर्वत्र कर उस पर रंग रगड़ते हुए, नंगे खड़े करना और फिर गांव से चले जाने को मजबूर करना....किसी भी किंमत पर स्वीकार्य नहीं हैं ।कल लिखा गया पोस्ट को मैंने रेजिश्ट्री करने हेतु तैयार रखा था ,परन्तु लेख चूँकि आग में घी का काम करता ,यह सोच कर पत्र को रेजिश्ट्री नहीं किया ,कुछ साथी शासन -प्रशासन पर दबाव बनने लगे है, ताकि सुनीता को न्याय मिल सकें ,लकिन मैं वर्तमान अराजक देश में यह आशा नहीं कर सकता कि आगे भी इसी तरह की घटना नहीं घटेगी !!!!ब्लोगार्स साथियों की सक्रियता और प्रतिक्रिया के कारण भी इस प्रकरण में नया मोढ लेना शुरू कर दिया है, महिनों भर चुप बैठी शासन -प्रशासन अब कुछ तो कर रही है ,हो सकता है यही `कुछ´अन्य संगठनों और महिला आयोग को भी सक्रिय कर दें ,मानवअधिकार के समर्थक भी आगे आए ...परन्तु हमें तो बर्बरता पर संघर्ष करते रहना है ।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

शिक्षिका को नंगी कर सरेआम अंग-अंग में रंग रगड़ा गया --न्याय न मिलने से माँगा इच्छा मृत्यु

एक शिक्षिका को सरेआम निर्वत्र कर अंग -अंग पर रंग रगड़ते हुए ,घर से बेघरबार होने को मजबूर सुनीता का दोष मात्र इतनी ही हैं कि वह एक शुद्र हैं !!!! ३० वर्षीया शिक्षा कर्मी जशपुर से लगा गांव केंदपानी संकूल, कस्तुरा में पदस्थ हुई ,अपनी 3 वर्षीय पुत्र और बूढे पिता के जिम्मेदारी लिए हुए एक परित्यक्ता की कहानी पर उसके मौत के बाद शानदार फिल्म बनने की इन्तेजार में आज भी न्याय नहीं मिला ,पुलिस और प्रशासन दोनों मौन ,घटना घटित हुए आज पॉंच माह बित चुका हैं ,नारी स्वतंत्रता
और समानता की दुहाई देने वाले समस्त संगठन भी मौन ...पुलिस जॉंच के नाम पर मात्र खाना पूर्ति कर प्रकरण को दबाने में लगे हुए हैं ,तात्कालिक थाना प्रभारी श्री भगत को लिखित शिकायत के साथ ही साथ पीड़िता श्रीमती सुनीता बंजुआ ने जिलाधीश डी.डी.सिंह को भी उचित कार्यावाही की गुहार लगाई थी ,परन्तु आज तक समस्त नारी जगत की अपमान पर सभी मौन हैं ,मजबूर होकर न्याय पाने की आश छोडकर शिक्षिका ने मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह व विभागीय शिक्षा मंत्री श्री बृजमोहन अग्रवाल के समक्ष गुहार लगाई कि पल -पल पर अपमानित होकर जीने से अच्छा मुझे ईच्छा मृत्यु दी जाए और चूंकि एक अबोध बालक की जिम्मेदारी और बूढे पिता के भार भी सामने हैं, अत: मौत के बाद दोनों की सुरक्षा सरकार करें । आज सुनीता ग्राम कस्तूरा में जान बचाने की डर से निर्वासित जीवन बिता रही हैं ,मानवता की दुहाई देना बहुत अच्छा लगता हैं पर जब किसी पर अत्याचार होता हैं, ओर समय पर न्याय न मिलने के कारण आक्रोशित नारी भवानी की रूप लेकर वही कार्य करती हैं जो एक समय फूलन देवी ने किया था । आज यदि कोई नक्शली सुनीता बंजुआ से मिलकर यह कहने लगे कि अपमान का बदला लेने के लिए हथियार उठाओ तुम्हें इस नपुंशक समाज ,शासन -प्रशासन से न्याय नहीं मिल सकता हैं अत: शासन प्रशासन और जिन्होंने भी तुम्हारा अपमान किया है उसे गोलियों से भून डालों ...ईच्छा मृत्यु से तो अच्छा बदला लेकर मौत को गले लगाओं .....? सोचिए आगे क्या हो सकता है !!!! जब मैं सुनीता के बारे में लिख रहा हुं तो उन पर हो रही अन्याय के खिलाफ भी मुझे आवाज उठाना चहिए ,पर आज के माहौल में मैं कितना मजबूर हूँ कि .... अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर मुझे भी हो सकता हैं नक्शली होने का आरोप लगा कर असानी से अनिश्चित काल तक जेल में ठूंस दिया जाए , पर इच्छा मृत्यु चाहने से अच्छा और चुपके से मौत को गले लगाने से भला यह हैं कि ,छत्तीसगढ के राजधानी रायपुर में धरना देकर बैठ जाना ,मैं बचन देता हूँ कि सुनीता के साथ मै भी तब तक धरने में बैठा रहूंगा जब तक उन्हें न्याय न मिल जाए । समाज जिसे शुद्र कहकर अपमान करता हैं ,21 वीं सदी के दम्भ भरने वाले लोग कुत्तें को तो गोद में उठा कर चुमने से नहीं चुकते और मानव समाज को घृणा करते हैं , ऐसे ओछे लोग मनुष्य नहीं ...हैवान हैं...समाज के दुश्मन हैं , अत: इन लोगों के कारण अपने आप को अपमानित महशूस करने की आवश्यकता नहीं हैं ,नंगे ये समाज हैं, अपमान ये समाज के ठेकेदार हुए,धर्म के नाम पर उंच नीच ,भेद -भाव का जो खेल खेला जा रहा है उसका अन्त होना ही हैं, देर हो सकता हैं पर अन्धेर नहीं हो सकता । जो समाज ,जो देश मानवता की रक्षा न सकें वह समाज नपूंशक हैं ......इस समाज से नंगे पन के अलावा और क्या आशा किया जा सकता है ??? इसका एक प्रति श्रीमती सुनीता को रेजिष्ट्री पोस्ट द्वारा भेज दिया गया हैं , आगे जो भी होगा उस पर क्या हमारे ब्लोगर भाई -बहनें कुछ विचार और व्यावहारिक कदम उठाने हेतु आगे नहीं आ सकतें ?

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

समलैंगिगता पर -अंधा बांटे कुत्ता खाय

समलैंगिकता पर लिखने के लिए बहुत दिनों से अपने आप को तैयार कर रहा था ,तैयारी इसलिए भी आवश्यक था क्योंकि मैंने एक माह के अन्तराल में लिंगानुभूति पर कुछ ज्यादा ही लिख दिया था ,मुझे भय लग रहा था कि कुछ लोग मुझे आयटम गर्ल जैसे आयटम ब्लोगर न समझ बैठे । हॉलाकि अभी भय कुछ कम हो गया ,फिर भी भय तो समलैंगिकों से बना हुआ है। कुछ दिन पूर्व ऐसे बहादूरों ने महानगर में बहुत बड़ी रैली निकाली ,नगाडों के थाप में ,ऐसे नाच रहे थे जैसे बंगाल जीतने की खूशी में अंग्रेजों के चहेते लार्ड क्लाईव ने रैली निकाली थी,कुछ इतिहासकारों ने लिखा था कि देखने वाले यदि उस रैली पर एक -एक पत्थर फेंका होता तो रैली वाले कुत्तों की मौत मरते । इस देश में तो कुत्तों की मौत पर लिखने में भी डर लगता है। क्योंकि कुत्ते प्रेमीयों की कमी नहीं हैं । कुत्ते प्रेमीयों के लिए इस वर्ष बहुत गर्व का हैं ,क्योंकि वे अब सीना ताने कह सकते है कि मेरे कुत्ता या कुतिया समलैंगिक नहीं है ,बात तो सही लगता हैं ,मैंने आज तक कुत्ते को किसी कुत्ते पर चढते नहीं देखा हैं , कुतिया के साथ तो झुंड के झुंड देखा जा सकता हैं । प्रकृति ने प्राणी को समलैंगिक नहीं बनाया ,विपरीत लिंगी में ही यौन सम्बन्ध हेतु उचित नियम बना हुआ है। अब देश के न्यायालयों पर मेरे जैसे लोग क्या टिप्पनी करें ,जो स्वयं ही लचार हैं ,पंगु हैं ,दुबीधा में समय गुजार रहे हैं उनके लिए टिप्पनी करना अच्छी बात नहीं है,जिस न्याय रूपी देवी के ऑंखों में पट्टी बन्धा हो ,उससे न्याय की कितनी आशा की जा सकती है यह तो सब समझने की बात हैं ,और सभी अन्दर की बात है। गंन्धारी ने तो पति के लिए ऑंखों में पट्टी बॉध ली थी ,हमारे न्याय देवी पता नहीं किसे अपना पति मानते हुए ऑंखों में आज भी पट्टी बॉंध रखी है। अंग्रेजों ने आजादी के पहले काले कोर्ट और न्याय देवी की आखों में पट्टी बंधने का दू:साहस किया था परन्तु आज भी कानून अन्धा हैं । अन्धा कानून से न्याय किसे मिलेगा ?अभी तो बलात्कार पर ३७६ धारा लगता हैं ,कल किसी बच्चों को उठाकर सामुहिक समलैंगिक का शिकार बनाया जाएगा ,बच्चे रोते -रोते घर में मॉं -बाप को शिकायत करने पर भी हम किसी पर कुछ भी करने लायक नहीं रहेंगे ,अराजकता की चरम सीमा ही कलियुग का अंत कहा गया हैं ,मुझे लगता है कि इस देश का अन्तिम समय आ चुका है। देश के हिजड़ों ने पुरुषों का लिंग काट कर अपने साथ मिला लिया करता हैं, ताकि दल भारी हो सके , अब समलैंगिकों को मजा आ जाएगा ,वे भी देश में अपना जुगाड़ लगाने शुरू कर देंगे । समलैंगिकता पर उपन्यास लिखा जाएगा , फिल्मों की बाढ आ जाएगी , प्रचार -प्रसार पर विशेष ध्यान दिया जाएगा ,शासकिय बजट में विशेष पैकेज का प्रावधान होगा । समलैंगिकों को समाज में महिमा मंडित करने के लिए नेता ,अभिनेता ,सरकारी साधु -सन्त सभी कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेंगे । इसी को कहते हैं कि अन्धा बॉंटे और कुत्ता खाय ।

बुधवार, 1 जुलाई 2009

क्या भारत कूड़े-डब्बे के सिवाय कुछ हैं ?

आज का भारत कूड़े -डब्बे के सिवाय कुछ रह गया है क्या ? मैकाले के शिक्षा पद्धति से लेकर अमेरिका का हर कूड़ा यही तो फेंका जाता हैं , विकसित देशों के नजर में भारत एक कूड़े दानी के सिवाय कुछ भी नहीं । अभी परमाणु सौदे में अमेरिका के जहरीले परमाणु कचड़ा भारत में डाल दिया जाएगा । सैकडों वर्षों तक, उस कचड़े से रेडिओ धर्मी का प्रभाव भारत के लोगों को ही तो झेलना पड़ेगा ,एक समय देश के जमीन को ज्यादा उपजाऊ बनाने के लिए हालैंड से सूआरों के गोबर मंगाने की पूरी तैयारी हो चुकी थी,देशी गाय की गोबर से बने खाद उपजाऊ नहीं ,पर सुअर के गोबर देश के लोगों को ज्यादा उपजाऊ लगता हैं । इस देश के बहू ज्यादा उपजाऊ नहीं है,अत: विदेशी बहू से राज कराना इस देश को अधिक भाता है। मुझे तो कभी-कभी ऐसा लगता है कि मैं देशी बनाम विदेशी हो गया हूँ । देशी संस्कृति कहीं ढूढने पर भी अपवाद स्वरूप भले मिल जाए ,परन्तु विदेशी भाषा खास करके अंगेजों के औलाद आज भी यही राज जमाए हुए हैं । इसे मैं कचडा कहूं या कुछ और, यह तो सुधी पाठक ही कह सकते है, परन्तु यहॉं भारतीयता ---देश प्रेम --स्वदेशी आदी तो गाली के सिवाय कुछ भी नहीं लगता , अब आगे खाने -पीने से लेकर शादी - विवाह तक सभी विदशी तर्ज पर हो रहा हैं तो इन सभी चीजों में जब मेरा भारत वर्ष ढूढता हूँ तो कही दिखाई नहीं देता हैं । कचड़े की ढेरों मे मेरा भारत कही खो गया है। भाई साहब ! बंगलादेश में नजरूल इस्लाम ,बंगलादेश में रविन्द्र नाथ ठाकुर ,बंकिम चन्द चटर्जी, क्रान्तिकारी सूर्य सेन , सबसे छोटी उम्र के शहीद खूदीराम बोस ,काकोरी प्रकरण ,ढाका के नागवंशी कान्तिकारी सुश्री लीला नाग जो आजीवन नेताजी सुभास चन्द्र बोस के साथ भारत में रहकर ही कार्य सम्पादन किया था । जो ऐतिहासिक भूल हमारे नेताओं ने किया है उसका सजा आज बंगाल के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। मैं इस बात से कदापि सहमत नहीं हूँ कि चाहे बंगाल के लोग हो या चाहे भारत के लोग या विदेश के अन्य -लोग, भारत में किसी भी प्रकार के षडयंत्र में लिप्त हो, और हम मौन रह कर सहन करते रहे, क्या देश में रह कर देशी लोग आतंकवादी कार्य को अन्जाम नहीं दे रहे है ?आज पाकिस्थानी आतंकवादी ,कश्मीरी आंतकवादी ,देशी आतंक वादी और न जाने कितने प्रकार के लोग देश को खोखला बनाने मे लगे हुए है। विदेशी ताकत तो देश में जहर बेचने का धंधा ही बना लिया है ताकि देश के लोग धीमी जहर पी पी कर चलता फिरता मूर्दा बना रहे ,और वे भी मूर्दो पर राज करके अरबों -खराबों से खेल सकें । बंगलादेशी पर मैंने लिखकर कोई बड़ा अपराध तो नहीं कर दिया हैं ? हमने अभी तमिलों को शरण दिया हैं ,नेपालीयों को तो हमने गोद में ही ले लिया हैं ,फिर बंगलादेशिओं पर इतनी आक्रोश क्यों है ? मेरे नजर में यह एक षडयंत्रकारी प्रचार के सिवाय कुछ भी नहीं है। आज इस लेखनी के माध्यम से भविष्यवाणी कहना चाहता हूँ कि निकट भविष्य में बंगलादेश भारत का ही अंग बन जाएगा -----मुझे एक भाई साहब ने बहुत ही भावूक कहा है, वास्तव में मैं भावूक हूँ , भावूक ही दूसरों का भाव समझ सकता हैं ,दूसरों का दू:ख -दर्द तो भावूक व्यक्ति ही समझ सकता है। और मुझे भावूक होने में कोई दोष नहीं दिखता । भाषा और वर्तनी सम्बन्धी दोष लेखनी में होने की बात भाई साब ने कही हैं ,मैं मात्र भाव को लेखनी के माध्यम से पहूंचाने का प्रयत्न करता हूँ ,यदि भाषा गत दोष दिखता हो तो कृपया स्वयं सुधारकर पढने का कष्ट करें ,मुझ पर बहुत उपकार होगा ।

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