गुरुवार, 28 मई 2009

पढ़े लिखे मूर्खों की देश में -सट्टा बनाम शेयर

भारत वर्ष में आज साक्षरों की संख्या दिनों दिन बढता जा रहा हैं ,परन्तु सुशिक्षा की ओर कदम आनुपातिक रूप से घटता की ओर हैं । साक्षर और सुशिक्षा में बहुत अन्तर हैं ,शिक्षा और सुशिक्षा में यदि अन्तर जानने की कोशिस करें तो पानी और जल या शुद्ध और विशुद्ध पर चिन्तन करना आवश्यक हैं । कुछ पुस्तकों को रट कर प्रविण्य सूचि में स्थान तो बनाया जा सकता है या अन्य साधनों का इस्तेमाल करके भी अंक बढाया जा सकता हैं ,परन्तु ज्ञान की कमी ही जीवन के मार्ग में हमेशा रोढे बन कर तोता रटन्त विद्या का मजाक उड़ाता रहेगा । देश दूनियॉं में आज डिग्री धाररियों की संख्या में बृद्धि तो हुई हैं ,पर दुनियॉं को भारी मंदी से ये नहीं बचा पाए । करोड़ों रूपये सलाना पाने वाले सीओ प्राय: फिसड्डी साबित हो चूंके हैं । प्रगतिशील कहलाने वाले अमेरिका आज मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहे हैं अनेक दिग्गज सीओं को बेरहमी के साथ विशाल कार्पोरेट जगत से निकाल दिया गया हैं । डिग्री हॉंसिल करके बहुत बड़े पद में पहूंच जाने मात्र से वे बहुत होशियार ओर व्यावहारिक होंगे यह आवश्यक नही हैं , ओर न इस बात की कोई गारंटी नहीं दे सकते हैं । मैं तो कहता हूँ कि आज इस देश में पढे लिखे मूर्खों की संख्या में लगातार बृद्धि हो रही हैं । एक बन्धुने मुझे लिखा कि भाई साब ! निवेश और सट्टा में बहुत अन्तर हैं ,दोनों को एक ही नजर से देखना नहीं चाहिए । मैं इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ ,किन्तु मैं जहॉं बैठा हूँ और जो कुछ भी देखा और अनूभव किया हैं ,उसे शब्द देने के लिए परिभाषा की आवश्यकता नहीं होती , यहॉं तो सट्टा बनाम शेयर हैं । निवेश और बचत की मार्केटिंग करते हुए एक लम्बे अन्तराल के बाद मैंने शेयर बाजार पर टिप्पनी किया हैं । यहॉं तो बचत का रकम ही निवेश कर दिया गया , एक दो प्रकरण होता तो शायद लिखने की आवश्यकता नहीं होती ,परन्तु लाखों नहीं करोड़ों में हैं । मैंने एक छोटी सी लेख`` डुब गया 30 हजार´´ में इसे स्पष्ट करने का प्रयत्न किया हैं । आज परिभाषाओं की नहीं; परन्तु व्यावहारिक मुल्यांकण पर विशेश ध्यान देने की आवश्यकता हैं ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपने अनुभव के आधार पर लिखा-हम ही अपनी बात वापस ले लेते हैं. वैसे तो मुझे टोरंटो और न्यूयॉर्क स्टाक एक्सचेन्ज पर काम करते हुए काफी बरस बीते पर निश्चित ही आपका अनुभव ज्यादा होगा, उसका मैं सम्मान करता हूँ. आप नाराज न हों ,मित्र.

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  2. बिल्‍कुल .. आखिर क्‍या कारण है कि डेढ साल के अंदर 21000 से गिरकर सेंसेक्‍स 7000 पर पहुंच जाता है .. और फिर अभी 15000 पर पहुंचने को है .. अर्थव्‍यवस्‍था न तो उतनी बिगडी और न ही उतनी संभली है।

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