बुधवार, 16 सितंबर 2009

भूल जाइए हिन्दी दिवस ---

मैंने अंग्रेजी दिवस मनाते हुए आज तक न देखा और न सुना हैं ,हर वर्ष धुमधाम से हिन्दी दिवस मनाने का एक परम्परा इस देश में चल निकला हैं । मेरे मित्र ने अभी हिन्दी दिवस के दिन फोन पर सम्पर्क किया और कहा कि फ्रेन्ड हिन्दी डे मनाना है होटल .....में 10 ए एम को आना जरूरी हैं । मैंने दोस्त को कहा कि भाई मैं तो आज का दिन अंग्रेजी की अर्थि दिवस के रूप में मनाना चाहता हूँ , क्या ऐसा नहीं हो सकता ?
हिन्दी दिवस में अग्रेजी की अर्थि दिवस मनाने से एक खास समाचार जनता तक पहुँचेगी कि जब तक अंग्रेजी का अर्थि इस देश से न निकले तब तक हिन्दी का भला हो ही नहीं सकता हैं । एक ही बील में सॉंप और चूहा कैसे रह सकता हैं ? अब अंग्रेजी सॉंप हैं या चूहा यह तो हम सबको मिलकर सोचना होगा । हमारे देश में तो दोनों का पूजा होता हैं ,एक ओर नाग देवता, दूसरी ओर गणेश जी के वाहन । मुझे तो बस भावना से आगे हिन्दी का विकास चाहिए ।
स्वामी विवेकान्द ने तो सम्पर्क भाषा के रूप में हिन्दी को ही विशेष स्थान दिया था ,यदि राष्ट्रभाषा के रूप में आज भी हिन्दी उपेक्षित हैं तो उसका एक मात्र कारण हैं कि हम अंग्रेजी का गुलाम बन चूके हैं ।
जिस तरह घर के प्रियजन के मौत होने के पश्चात यथाशीघ्र शव को परम्परानुसार क्रिया कर्म किया जाता हैं ,क्योंकि सभी को भय रहता हैं कि यदि सडन लग जाए तो रहना मुस्किल हो जाएगा । ठीक उसी प्रकार जिस दिन इस देश से अंग्रेज सत्ता की मौत हो चूकी थी उसी दिन से अंग्रेजी और अंग्रेजीयत की शव को दफन कफन कर देना चाहिए था । पर ऐसा नहीं हुआ ,अत: उस शव के सडन से दुर्गन्ध तो आना ही हैं ।
जितनी जल्दी हो सके अंग्रेजी की अर्थि उठाकर दफन कर दिया जाए ,नही तो बदबू से तमाम प्रकार के रोगों से हम मरते रहेंगे ।
प्रथमत: धनादेश पर हिन्दी में ही हस्ताक्षर करना शुरू किया जा सकता हैं । अक्षरों को हिन्दी में लिखना और वाक्यों में लिखना अपने आप में कान्तिकारी कदम हो सकता हैं । मैंने यह किया हैं ,अच्छा लगता हैं, आप भी यदि सचमुच हिन्दी का भला चाहते हैं तो अवश्य शुरू किजीए । यदि असुद्ध होने लगे तो भय की क्या बात हैं ? शुद्ध असुद्ध तो हमने तय किया हैं ,जब मरा -मरा जपते हुए रत्नाकर दस्यु वािल्मकी बनकर रामायण की रचना कर सकते हैं तो क्या असुद्ध लिखते लिखते शुद्ध नहीं हो जाएगा ?
बंगला भाषी होने पर भी मैंने हिन्दी में लिखना शुरू किया हैं ,असुद्ध लिखता हूँ ,पहले और आज के लेखन में मैंने स्वयं बहुत अन्तर देख रहा हूँ ,उन अंग्रेजों के औलादों से तो मैं ठीक कर रहा हूं न ?? छोटी छोटी शुरूआत समुद्र भी बनेगा ...अवश्य बनेगा....इसलिए हिन्दी दिवस भूल जाइए ..अंग्रेजी का अर्थि दिवस प्रारंभ....तो देर किस बात की ...

2 टिप्‍पणियां:

  1. किसी लकीर को बड़ी साबित करने के लिए दूसरी को छोटा करना उचित नहीं..बड़ी लकीर बनाओ तो अपने आप दूसरी छोटी हो जायेगी.

    अंग्रेजी की अर्थी निकालने की कतई जरुरत नहीं है. बस, हिन्दी को समृद्ध बनाना है.

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  2. आपका विचार उत्तम है
    अभिनन्दन !

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