रविवार, 27 सितंबर 2009

कम्युनिस्ट गाली बनकर रह गया ---सहयोग के लिए बहुत बहुत आभार

देश में क्रान्तिकारि परिवर्तण की आवश्यकता क्यों हैं ? क्रांति की बातें तो अनेक लोग और दल करती हैं ,परन्तु जब व्यवहारिक धरातल पर कार्यकलापों का मुल्यांकन किया जाता हैं, तो देश में अपवाद छोडकर सभी से निराशा ही निराशा .....कम्युनिष्टों ने तो हद ही कर दी, प.बं कम्युनिष्टों का गढ माना जाता है ,वहॉं सिंगुर की घटना ,लालगढ की घटना और बंगाल की आर्थिक सामाजिक स्थितियों को देखते हुए हम नहीं कह सकते कि कम्युनिष्ट गरिबों और मजदूरों का दल हैं ।

कम्युनिष्ट शासन ,गरिबों पर गोलीयॉं चलाती हैं और उनसे जमीन छिनकर अमीरों को बॉंटती है , बंगाल में तो कम्युनिष्टों का गुण्डागर्दी खुलेआम चलने के साथ ही साथ यदि कोई विरोध करें तो उसे भी मौत के घाट उतार दिया जाता हैं ।

चौथ वसूल करके दादाओं का धंधा चलता हैं ,राष्ट्रीय रोजगार योजना हो या गरिबी भत्ता सभी में दादाओं का हिस्सा होता हैं । सरकार को सभी खबर हैं फिर भी मौन है ,कम्युनिष्टों की ऐसा घिनौना रूप जिसे देख और सुन कर शर्म से सिर झुक जाती हैं ।

उक्त घटनाओं को देखते हुए आज भी कुछ लोग अपने आप को कम्युनिष्ट कहते हैं, उनका तर्क हैं कि मार्क्स और माओ दोनों के सिद्धान्त अच्छा हैं ,मै उन लोगों को पुछता हूं कि यदि सचमुच सिद्धान्त अच्छी होती तो अन्तिम भी अच्छा होना चाहिए था ,किन्तु जब अन्तिम ठीक उल्टा हो रहा है तो किस सिद्धान्त का तारिफ किया जाए ?

एक गायक जिसे साधारण बोलचाल में भले ही अच्छा न लगता हो , लेकिन गाने के पश्चात लोगों का मन मोह लेता है, ऐसी स्थिति को मैं अन्तिम स्थिति कहता हूँ । इसका अर्थ यह हुआ कि सिद्धान्त चाहे कुछ भी हो, पर उसकी अन्तिम स्थिति यदि कुरूप हो ,घिनौना भरा हो ,नफरत योग्य हो ,तो उस सिद्धान्त का समर्थन किसी भी हालत में नहीं किया जा सकता हैं ।

माओवादिओं के नाम से देश में जो कुछ भी हो रहा हैं ,क्या उन सभी का समर्थन करना पडेगा ? किसी की बहु बेटी को जोर-जबरदस्ती घर से उठा कर माओवादी बना देना , उनके विरोध करने पर हत्या कर देना ,घर को जला देना , स्कुलों को जला देना , बिजली खम्भों को उखाड़ कर सभी को अंधेरे में रहने को मजबुर कर देना , गरिबों के लिए उपलब्ध करवाए जा रहे अनाजों को लूट लेना , आदी ...अनेक घटनाओं का उल्लेख किया जा सकता हैं, जो की अमानवीय और असभ्यता से परिपूर्ण है।
अमीर भी अत्याचार करते हैं और मैं उन अमीरों को फूटी ऑखों से देखना भी पसन्द नहीं करता ,परन्तु माओवादी के नाम से गरिबों पर अत्याचार कौन सी सिद्धान्त में आता हैं ?
भाई शरद कोकास ने मुझे प्रमाण पत्र दे दिया कि मैं भी मार्क्स का ही समर्थक हूँ , भाई शरद ! कृपया मुझे किसी वाद पर बॉधने का प्रयत्न न करें ,मैंने पूर्व पोस्ट में जो कुछ भी लिखा है ,उन सभी तथ्यों को मार्क्स समर्थन नहीं कर सकते है।

गुणानुपात का अर्थ यह हैं कि सुविधा, गुण के अनुपात में मिलना चाहिए ,जो अधिक गुणी है समाज उसे अधिक सुविधा दें ,शारिरीक श्रम और मानसीक श्रम में बहुत अन्तर हैं ,मैं यह भी मानता हूँ कि दोनों श्रम एक दूसरे का पूरक भी हैं, परन्तु जब आनुपातिक रूप से मानसिक श्रम अधिक हो तो उसे आनुपातिक रूप से शारीरिक श्रम के अपेक्षा अधिक सुविधा देना आवश्यक है ।

एक साफ्टवेयर इंजिनीयर को एसी की आवश्यकता हो सकती है ,परन्तु एक रास्ते में फावड़ा चलाने वाले को वह उपयोगी नहीं हैं । एक साधारण शिक्षक को पाठशाला जाने के लिए साईकल की आवश्यकता हो सकती हैं परन्तु एक अच्छी डाक्टर को मरीज देखने के लिए और त्वरीत सेवा उपलब्ध होसके इसलिए उसे मोटर साईकल या कार या हवाई जहाज की व्यवस्था किया जाना आवश्यक हैं ।
प्राकृतिक संशाधनों का उपयोग मात्र धन होने पर ही उपलब्ध करवाना ठीक नहीं है। जैसे पैट्रोल डीजल,आदी का उपयोग आवश्यकतानुसार ही करना चाहिए ।

समीर भाई ,रतन सिंह जी , राकेश झा जी को धन्यवाद १ सुमनजी ! हो सकता हैं इस पोस्ट द्वारा आपको कुछ टिप्पनी का झलक मिल जाएगा ,काजल जी ! मानव निर्मित व्यवस्था में यदि सडन पैदा हो गई हो तो उपचार भी जरूरी है !

2 टिप्‍पणियां:

  1. ये क्रांतिकारी सिर्फ गरीबो व मजदूरों को उनके हक़ की बाते करके छलते है मकसद सिर्फ सत्ता प्राप्त कर तानाशाही कायम करना होता है मार्क्स आदि की विचार धाराए सिर्फ किताबों में पढने पर अच्छी लग सकती है व्यवहार में कदापि नहीं | दुनिया में जहाँ कमुनिस्ट थे उनका हाल देख लिया अब बंगाल में इनकी पोल खुल रही है जनता को कोई भी शक्ति ज्यादा देर नहीं दबा कर रख सकती कभी तो पाप का घडा भरता ही है और शायद बंगाल में भी इनके पापो का अंत जल्द ही होगा |
    इन वामपंथियों के बंगाल में किए काले कारनामे देश की जनता के सामने उजागर होने चाहिए ताकि देश के अन्य भागों में गरीब व मजदुर इनकी नियत जान सके व इनके द्वारा छलने से बच सके |

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  2. आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि ये कि दूसरो को बेवकूफ समझ बैठे हो.....

    "गुणानुपात का अर्थ यह हैं कि सुविधा, गुण के अनुपात में मिलना चाहिए ,जो अधिक गुणी है समाज उसे अधिक सुविधा दें ,शारिरीक श्रम और मानसीक श्रम में बहुत अन्तर हैं ,मैं यह भी मानता हूँ कि दोनों श्रम एक दूसरे का पूरक भी हैं, परन्तु जब आनुपातिक रूप से मानसिक श्रम अधिक हो तो उसे आनुपातिक रूप से शारीरिक श्रम के अपेक्षा अधिक सुविधा देना आवश्यक है ।

    एक साफ्टवेयर इंजिनीयर को एसी की आवश्यकता हो सकती है ,परन्तु एक रास्ते में फावड़ा चलाने वाले को वह उपयोगी नहीं हैं । एक साधारण शिक्षक को पाठशाला जाने के लिए साईकल की आवश्यकता हो सकती हैं परन्तु एक अच्छी डाक्टर को मरीज देखने के लिए और त्वरीत सेवा उपलब्ध होसके इसलिए उसे मोटर साईकल या कार या हवाई जहाज की व्यवस्था किया जाना आवश्यक हैं ।
    प्राकृतिक संशाधनों का उपयोग मात्र धन होने पर ही उपलब्ध करवाना ठीक नहीं है। जैसे पैट्रोल डीजल,आदी का उपयोग आवश्यकतानुसार ही करना चाहिए ।"

    ज़रा मार्क्सवाद में ही ढूंढ़ कर बताइए कि इस तरह का कौन सा उद्धरण आपने पढ़ा है...और मजदूर से अर्थ आप फावड़ा चलाने वाले को समझते हैं..या सोफ्टवेयर इन्गीनियर ऐ सी का प्रयोग न करें ऐसा कहाँ लिखा है...या ये भी कहा लिखा है कि फावड़ा चलाने वाला मजदूर को ऐ सी या इस तरह के संसाधन उपलब्ध कराएं जाएँ.....तो आप बिलकुल भी परिचित नहीं है बंधू मार्क्सवाद से..
    विस्थापन के नाम पर सिंगुर का नाम लेते हैं तो अपने आस पास के कुछ क्षेत्रों में बन्ने वाले पावर प्रोजेक्टों को देखिये.....अधिग्रहण के नाम पर मीन आपको बहुत सारे उदाहरण दूंगा..अवैध अधिग्रहण के नाम पर...जो सिंगुर और नंदीग्राम से भी भयानक हैं.... मार्क्सवाद के पक्ष में होने की बात नहीं राय साहब..मसला ये कि आप अपनी बात को ही नहीं रख पाए..जब आप मार्क्सवाद के मुलभुत सिद्धांतों से ही परिचित नहीं हैं....तो आपकी आलोचना को कैसे स्वीकार किया जाए....ये तो कुछ ऐसा ही होगा कि एक हिन्दू ने क़त्ल किया और हम ने मान लिया कि हिन्दू धर्म ही बकवास है...जैसा की आप कह रहे हैं...चीन रूस नंदीग्राम ये कम्युनिस्टों के कारनामे हैं...खोट विचारधारा में हो तो उसको सहर्ष त्यागा जाए.... मगर त्यागने से पहले विचारधारा को ही नहीं समझा जाए और क्रियाकलापों को देखकर आलोचना शुरू की जाए तो बकवास है...हिटलर को त्यागने से पहले उसकी रचना कर्म को त्यागने से पहले उसकी कृतियों को पढ़ा जाए..अगर उसमें नफरत है तो आप सहर्ष त्याग दें गे.हालांकि मैं हिटलर के पक्ष में नहीं हूँ...
    मार्क्सवाद अमीर गरीब की पड़ताल किस तरह से करता है इसको सम्झैएन...अमीर का विरोधी या गरीब का हिमायती वह कतई नहीं है... वह अमीर होने की सम्भावना की पड़ताल करता है...और गरीब होने की शर्तों की पड़ताल करके...विवेचना स्वरूप अमीर गरीब की सम्भावना और उनकी स्थितियों को स्पष्ट करता है...
    अगर इस तरह कि अधूरी बातों को कहेंगे तो न ही आपकी छवि स्पष्ट होगी न ही उसकी जिसकी आप करना चाहते हैं...

    nishant

    kaushiknishant2@gmail.com

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